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शुभ-भ्रमण

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शुभ-भ्रमण

29 जन॰ 2013

मन मन ही मन में घुलता है



चुप चाप समाधि सी बैठूं
जीवन क्या यही शिथिलता है
 
मन सदा अशांत ही रहता है
मन मन ही मन में घुलता है
 

खोकर अपना नन्हा सा शिशु
न प्यार तुम्हारा पाया है
कैसे तुम पत्थर दिल साथी
मन में भरी विकलता है
 
खाना पीना खा लूँ सो लूँ
अपना रोना किसको रो लूँ
 
न कोई तत्परता अब
न कोई चंचलता है
 चहुँ और न कोई आश्वाशन
मन समझे न कोई भाषा
कैसे मन को समझाऊं मै
मेरे अंतर व्याकुलता है

17 सित॰ 2012

"मेरे घर आये है साजन"


मेरे घर आये है साजन
आँगन निखर गया

बरसी थी नैनो की बदली
धो गयी सब काजल और कजली
रोग शोक दुःख पीड़ा
जाने किधर गया

हम मिलकर तुमसे हरसाए
सबको अपने सजन दिखाए
खूब खूब खुद पे इतराए
विरह वेदना का रोना
सब बिसर गया


1 जून 2012

गजल सा ये चेहरा...!

किसी फूल की पंखुरी से मुलायम
बहुत खूबसूरत गजल सा ये चेहरा

ये आँखें है या मुस्कराती दो कलियाँ
किसी झील में इक कमल सा ये चेहरा