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शुभ-भ्रमण

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शुभ-भ्रमण

29/01/2013

मन मन ही मन में घुलता है



चुप चाप समाधि सी बैठूं
जीवन क्या यही शिथिलता है
 
मन सदा अशांत ही रहता है
मन मन ही मन में घुलता है
 

खोकर अपना नन्हा सा शिशु
न प्यार तुम्हारा पाया है
कैसे तुम पत्थर दिल साथी
मन में भरी विकलता है
 
खाना पीना खा लूँ सो लूँ
अपना रोना किसको रो लूँ
 
न कोई तत्परता अब
न कोई चंचलता है
 चहुँ और न कोई आश्वाशन
मन समझे न कोई भाषा
कैसे मन को समझाऊं मै
मेरे अंतर व्याकुलता है

15 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. आभार आदरणीय भारतीय नागरिक जी! सम्वेदना ने आपके ह्रदय को स्पर्श किया

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  2. कैसे मन को समझाऊं मै
    मेरे अंतर व्याकुलता है

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    उत्तर
    1. उत्साह वर्धन हेतु आभार आदरणीय राकेश कौशिक जी!

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  3. चहुँ और न कोई आश्वाशन
    मन समझे न कोई भाषा
    कैसे मन को समझाऊं मै
    मेरे अंतर व्याकुलता है,,,,

    उम्दा भावअभिव्यक्ति ,,,

    RECENT POST... नवगीत,

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    1. धनयवाद सराहना हेतु आदरणीय धीरेन्द्र सिंह भदौरिया जी !

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  4. बहुत सुन्दर लिखा हे आपने

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    1. दिल के जज्बात काव्य रूप में समझने के लिए तहे दिल से शुक्रिया किशन

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  5. आदरेया आज पहली बार आपके ब्लाग का अवलोकन किया बहुत अच्छा लगा।
    भाव से सराबोर इस रचना के लिए सादर बधाई आपको ।
    मुझे पहचाना वेदिका बहन?अरे वही आपकी ओ बी ओ वाली 'पड़ोसन'।

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    1. ओह जी हाँ हाँ वन्दना जी!
      बड़ी ख़ुशी हुयी आपको यहाँ पाकर ....आभार

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  6. आपकी यह अप्रतिम प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गई है।कृपया http://nirjhar-times.blogspot.com पर पधारकर अवलोकन करें और आपका सुझाव/प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।

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    1. ओह जी हाँ हाँ वन्दना जी!
      बड़ी ख़ुशी हुयी आपको यहाँ पाकर ....आभार

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  7. उत्तर
    1. आभार आदरणीय संगीता जी!
      स्नेह बनाये रखिये

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