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शुभ-भ्रमण

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शुभ-भ्रमण

18 मार्च 2013

"और कहूँ क्या "



मेरे दिल की

गहराइयों में तुम

आये सौंधी हवा बन के

महका गये सुगंध

आंगन भर हाय राम

रोम रोम

रोमांचित करते

सुध बुध भूली

सब जग भूली  

याद रहे बस तुम 

लेकिन चतुर साथी

जाते जाते छोड़ गये तूफान

घना और भीषण हाय

सब अस्त-व्यस्त 

और कहूँ क्या

शेष नहीं कुछ भी 

शेष नही कुछ भी ...............गीतिका 'वेदिका'

                                          १८ -०३ -२ ० १३    ०३ :२२  अपरान्ह 

12 मार्च 2013

"फागुन का हरकारा”


  गीतिका 'वेदिका   

 "फागुन का हरकारा”


भंग छने रंग घने
फागुन का हरकारा

टेसू सा लौह रंग
पीली सरसों के संग
सब रंग काम के है
 कोई नही नाकारा

बौर भरीं साखें है
नशे भरी आँखें है
होली की ठिठोली में
 चित्त हुआ मतवारा

जित देखो धूम मची
टोलियों को घूम मची
कोई न बेरंग आज
रंग रंगा जग सारा

मुठी भर गुलाल लो
दुश्मनी पे डाल दो
हुयी बैर प्रीत, बुरा;
मानो नही यह नारा

मन महके तन महके
वन औ उपवन महके
महके धरा औ गगन
औ गगन का हर तारा

जीजा है साली है
देवर है भाभी है
सात रंग रंगों को
रंगों ने रंग  डारा

चार अच्छे कच्चे रंग
प्रीत के दो सच्चे रंग
निरख निरख रंगों को
तन हारा मन हारा

          8/03/2013 1:45pm

29 जन॰ 2013

मन मन ही मन में घुलता है



चुप चाप समाधि सी बैठूं
जीवन क्या यही शिथिलता है
 
मन सदा अशांत ही रहता है
मन मन ही मन में घुलता है
 

खोकर अपना नन्हा सा शिशु
न प्यार तुम्हारा पाया है
कैसे तुम पत्थर दिल साथी
मन में भरी विकलता है
 
खाना पीना खा लूँ सो लूँ
अपना रोना किसको रो लूँ
 
न कोई तत्परता अब
न कोई चंचलता है
 चहुँ और न कोई आश्वाशन
मन समझे न कोई भाषा
कैसे मन को समझाऊं मै
मेरे अंतर व्याकुलता है